यारों घर पर तो अपना आना जाना चलता है
फिर क्यूँ मुझ को अपना कमरा वीराना खलता है
वो निकला तो ऐसे निकला मेरे दिल से लेकिन
अब तक मेरे सीने का बायाँ हिस्सा जलता है
मम्मी की दो रोटी में भी बॉडी बन जाती थी
बाहर चाहे जितना खा लें पर ढांँचा गलता है
— Yashvardhan Mishra 'Hind'















