fazaa-e-shahr ko vahshat-asar tasleem karte hain | फ़ज़ा-ए-शहर को वहशत-असर तस्लीम करते हैं

  - Yawar Azeem
फ़ज़ा-ए-शहरकोवहशत-असरतस्लीमकरतेहैं
दिलोंमेंछपकेबैठाहैजोडरतस्लीमकरतेहैं
हमारेघरकीतन्हाईपेपूराहक़हमाराहै
उसेहमअपनेआँगनकाशजरतस्लीमकरतेहैं
जोसचपूछोतोअबवोशयनहींअपनेठिकानेपर
येहमहैंजोउसेअबतकइधरतस्लीमकरतेहैं
मिरीशोरीदगीमुझकोकहींथमनेनहींदेती
भँवरमुझकोब-ज़ात-ए-ख़ुदभँवरतस्लीमकरतेहैं
हमारीज़ातसेसंजीदगीकाख़ोलउतराहै
येतेरीदिल-नवाज़ीकाअसरतस्लीमकरतेहैं
हमइनमहताबचेहरोंकेजिलौमेंघूमनेवाले
तिरीयादोंकोअपनाहम-सफ़रतस्लीमकरतेहैं
वबाजोशहरमेंफैलीहैवोरुकनेनहींवाली
समझतेहैंहमारेचारा-गरतस्लीमकरतेहैं
किसीइंसानसेअपनीतबीअ'तमिलनहींसकती
सबअपनेआपकोफ़र्रूख़-सियरतस्लीमकरतेहैं
तिरीक़ुदरतकेआगेबसनहींचलताकिसीशयका
तिरेबंदेतिरेमुहताज-ए-दरतस्लीमकरतेहैं
अजबज़ौक़-ए-नज़ारादीदा-ए-पुरनमनेबख़्शाहै
ज़िया-ए-अश्ककोआब-ए-गुहरतस्लीमकरतेहैं
मैंअपनीशा'इरीसेमुतमइनहोतानहीं'यावर'
अगरचेमुझकोसबअहल-ए-हुनरतस्लीमकरतेहैं
  - Yawar Azeem
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Shehar Shayari

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