इस शहर में अब रक़्स बोलो कौन करता है ख़ुदा
ये शहर अब ख़ामोश इतना क्यूँ ही रहता है ख़ुदा
मैंने उसे ये सोच कर रक्खा बुरे लोगों के बीच
कब साफ़ पानी में कमल का फूल खिलता है ख़ुदा
मुझको तो लगता है उसे जैसे नज़र ही लग गई
है फ़न बहुत फिर भी वो लोगों को तरसता है ख़ुदा
उसके मुक़द्दर में कहाँ है जीत की रेखा बशर
हारे हुए लोगों का वो मुर्शिद है कहता है ख़ुदा
माँ बाप के ही प्यार से रौशन था ये मेरा जहाँ
और छीन कर के प्यार मेरा ख़ूब हँसता है ख़ुदा
मैं भी कभी अपना समझता था उसे पर अब नहीं
फुसला के वो तो प्यार से लोगों को छलता है ख़ुदा
तरुण पाण्डेय
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