is shahar men ab raqs bolo kaun karta hai khuda | इस शहर में अब रक़्स बोलो कौन करता है ख़ुदा

  - Tarun Pandey

इस शहर में अब रक़्स बोलो कौन करता है ख़ुदा
ये शहर अब ख़ामोश इतना क्यूँ ही रहता है ख़ुदा


मैंने उसे ये सोच कर रक्खा बुरे लोगों के बीच

कब साफ़ पानी में कमल का फूल खिलता है ख़ुदा
मुझको तो लगता है उसे जैसे नज़र ही लग गई

है फ़न बहुत फिर भी वो लोगों को तरसता है ख़ुदा
उसके मुक़द्दर में कहाँ है जीत की रेखा बशर

हारे हुए लोगों का वो मुर्शिद है कहता है ख़ुदा
माँ बाप के ही प्यार से रौशन था ये मेरा जहाँ

और छीन कर के प्यार मेरा ख़ूब हँसता है ख़ुदा
मैं भी कभी अपना समझता था उसे पर अब नहीं

फुसला के वो तो प्यार से लोगों को छलता है ख़ुदा
तरुण पाण्डेय

  - Tarun Pandey

Raqs Shayari

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