किया बर्बाद यूँँ ख़ुद को यहाँ झूठी ख़ुदाई पर
रहा रुसवा ज़माने से क़यामी बेवफ़ाई पर
ज़माने ने बहुत खेला हमारे नाम से साथी
रुला कर दूसरों को हँस रही क़िस्मत जुदाई पर
नयापन है लिबासों में मगर आदत पुरानी है
यहाँ दौलत बहुत हावी रही देखो रसाई पर
बना कर घर नज़र में बन गया भगवान वो यूँँही
मगर सोचो गरीबों को मिले सब घर तराई पर
बग़ावत है भड़कती सिर्फ़ सच्चाई छुपाने को
बग़ावत क्यूँ नहीं होती रिवायत की बुराई पर
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