ये बात सोच के तेरे हुए हैं हम दोनों

कि तुझ को ले के बहुत लड़ चुके हैं हम दोनों

ये सरहदें तो अभी कल बनी हैं मेरे दोस्त
हज़ारों साल इकट्ठे रहे हैं हम दोनों

कोई तो था वो जो अब हाफ़िज़े का हिस्सा नहीं
वो बात क्या थी जो भूले हुए हैं हम दोनों

तुम ऐसी बात किसी को नहीं बताओगी
मुझे लगा था बड़े हो चुके हैं हम दोनों

इकट्ठे सिर्फ़ गली से नहीं गुज़रने लगे
किसी के दिल से गुज़रने लगे हैं हम दोनों

हज़ारों जोड़े गुलाबों में छिप के बैठे हैं
ये और बात कि पकड़े गए हैं हम दोनों

— Zia Mazkoor

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