Aditya
Aditya
Nazm

“मुझ

में बाकी तुम”

कभी तन्हाइयों में जब हमें तुम याद आते हो
जुदा होते हुए भी साथ में लम्हे बिताते हो
तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं

कभी जब डूबने लगता हूँ दुनिया के फसानों में
तुम्हीं यादों में आ कर फिर मुझे साहिल पे लाते हो
तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं

हमारे इश्क़ के चर्चे अगर होते हैं महफ़िल में
नमी आँखों में ला कर के हमें भी तुम रुलाते हो
तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं

मुझे ये वक़्त चुभता है कभी जब खार के जैसे
मेरे जख्मों पे चुपके से तुम्हीं गुलशन सजाते हो
तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं

— Aditya

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