हैं मुक़म्मल कुछ न बेबस रह गए
ख़्वाब सारे रेत बन के ढह गए
रहते थे पलकों पे जिन की हम कभी
अपने भी हम को बुरा वो कह गए
साथ बे-मतलब नहीं मिलता यहाँ
सोच कर ये मतलबी भी सह गए
बस हुआ तक़दीर या है कुछ अभी
तीर तरकश में है कितने रह गए
ज़ीस्त की 'आभा' मरम्मत में कई
ख़ुश-नुमा लम्हे जिए बिन बह गए
— Abha sethi















