मैं घर से निकला था सोच कर तुम मुझे मिलोगे

ग़म-ए-जहाँ से हो बे-ख़बर, तुम मुझे मिलोगे

मैं कह रहा हूँ मैं तुम को जाने न दूँगा जानाँ
जो इस तरह ख़्वाब में अगर तुम मुझे मिलोगे

ये चाँद तारे, ये फूल ख़ुशबू, ये शा-ओ-शौकत
मुझे मिलेंगे उधर, जिधर तुम मुझे मिलोगे

कहीं ख़ुशी से मैं मर न जाऊँ मुझे बचा लो
कि मिल गई है मुझे ख़बर, तुम मुझे मिलोगे

करे कोई भी अगर-मगर, तुम न ध्यान देना
करे कोई भी अगर-मगर, तुम मुझे मिलोगे

अगर ज़मीं पर न मिल सके हम तो क्या ही होगा
तो फिर ज़मीं से ज़रा अधर तुम मुझे मिलोगे

ज़मीं कहीं आसमाँ से खुलकर अगर मिलेगी
यही है किस्मत मेरी, उधर तुम मुझे मिलोगे

— Lokendra Faujdar 'Aham'

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