रूठा था इक गुलाब सो लाया गया गुलाब
हम से न देखा जा सका रूठा हुआ गुलाब
ले जा रहा है गुलचीं जिसे तोड़कर अभी
है बाग़बाँ का सब्र वो खिलता हुआ गुलाब
काँटे हटाते वक़्त सुना था किसी ने क्या
ये मेरे प्यारे दोस्त हैं कहता रहा गुलाब
सूरत भी तब गुलाब की होने लगी थी लाल
जब रूबरू गुलाब के आने लगा गुलाब
इंसान ख़ूब था वो प' लहजा नहीं था नर्म
मोती जड़े हुए थे प' काग़ज़ का था गुलाब
खुशक़िस्मती गुलाब की काँटों से घिर गया
बदक़िस्मती थी उन से बिछड़ता हुआ गुलाब
— Lokendra Faujdar 'Aham'















