पुराने इश्क़ के पुर्जे ठिकाने लग गए हैं
कि कूचे में नए कुछ लोग आने लग गए हैं
ज़माने की वजह से तोड़ने पड़ जाएँगे जो
वही रिश्ते बनाने में ज़माने लग गए हैं
जहाँ पर बैठ कर उड़ते थे ख़्वाबों में कभी हम
उन्हीं गलियों में फिर से आने जाने लग गए है
हमारा राब्ता दुनिया से इतना रह गया है
कि ख़ुद के शे'र ख़ुद ही को सुनाने लग गए हैं
जो बातें दर्द देती थीं, हँसाती हैं बहुत अब
वो दिलकश दिलरुबा मंज़र रुलाने लग गए हैं
— Lokendra Faujdar 'Aham'















