यक़ीनन मुझे कुछ बड़ा सोचना है

यही सोचता हूँ कि क्या सोचना है

उसे याद कोई दिलाओ ये जा कर
कि वोटों का परदा हटा, सोचना है

ख़्यालात मेरे वहीं फिर रहे हैं
मैं कितना भी सोचूँ नया सोचना है

इशारों इशारों में सब कह चुका हूँ
तुम्हीं सोचो अब तुम को क्या सोचना है

सर-ए-राह कब तक यूँ बैठे रहोगे
वही शख़्स क्यूँ बारहा सोचना है

हमें शाइरों में गिना जा रहा है
हमें आज से जा ब जा सोचना है

किधर से उगेगा, छिपेगा किधर को
सुख़न-वर तुझे हर दिशा सोचना है

भला, सोचने में भी कैसा तक़ल्लुफ़
कोई सिर्फ़ कह दे ज़रा सोचना है

— Lokendra Faujdar 'Aham'

More by Lokendra Faujdar 'Aham'

Other ghazal from the same pen

See all from Lokendra Faujdar 'Aham' →

Ishaara Shayari

Shers of ishaara.

All Ishaara Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling