ret jaisa fisal gaya mujhse | रेत जैसा फिसल गया मुझ सेे

  - Aqib khan

रेत जैसा फिसल गया मुझ सेे
वक़्त आगे निकल गया मुझ सेे

वो जो सूरज था मेरे हिस्से में
शाम से पहले ढल गया मुझ सेे

माँ ने फेरा था सर पे हाथ मेरे
ख़ुद-ब-ख़ुद खतरा टल गया मुझ सेे

वो जिसे चुप करा न पाया कोई
जाने कैसे बहल गया मुझ सेे

तुझको तो क़द्र-ए-कामयाबी है
फिर भला क्यूँँ तू जल गया मुझ सेे

सब्र बे-इंतिहा किया था सो
सब्र का था जो फल गया मुझ सेे

वक़्त बदला तो सब बदलने लगे
सिक्का खोटा भी चल गया मुझ सेे

  - Aqib khan

Dushman Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Aqib khan

As you were reading Shayari by Aqib khan

Similar Writers

our suggestion based on Aqib khan

Similar Moods

As you were reading Dushman Shayari Shayari