बाद उसके कोई जचा ही नहीं
इश्क़ जैसी कोई बला ही नहीं
उसने जब बात की समझ आया
ख़ामुशी से बड़ी सज़ा ही नहीं
पूरी बोतल उतार दी गले से
मुझ को फिर भी नशा हुआ ही नहीं
उस ने यूँ छील के उतारी हिना
रंग फिर कोई भी रचा ही नहीं
इन लरज़ते लबों से क्यूँ तूने
सुर्ख़ आँखों को फिर छुआ ही नहीं
ईद भी आ गई मिरे मौला
मेरा घर अब तलक सजा ही नहीं
उस को लौटा सके जो बाँहों में
ऐसा तो कोई मोजिज़ा ही नहीं
जो दिया सच की आग से रौशन
वो तो दरिया से भी बुझा ही नहीं
आज भूखे ही सो गए बच्चे
आज कासा मिरा भरा ही नहीं
आग ऐसी अमान देखी है
पास हो कर भी मैं जला ही नहीं
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