आज़ मैं ये कह रही हूँ ज़िंदगी को अलविदा
बात सारी ख़त्म करके शायरी को अलविदा
एक बोला काट दो फिर एक बोला मार दो
मार दो हमको अगर हो तीरगी से अलविदा
किस तरह से है गुज़रता कौन पूछे हाल को
मौत आसाँ हो अगर तो मुफ़लिसी से अलविदा
जिस्म की चाहत सभी को रूह से मतलब किसे
ऐ ख़ुदा सारे तेरे इन मुत्तक़ी से अलविदा
कौन है अपना यहाँ सब जानकर अनजान हैं
हाल इसका देखकर अब बम्बई से अलविदा
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