"मैं सावन भर दूर रहा फिर कैसे दिन बीते होंगे"
मैं सावन भर दूर रहा फिर कैसे दिन बीते होंगे
दिल भी बहुत ठिठुरता होगा कैसे तुम जीते होगे
शकल सेज पर वही पुरानी बात याद आती होगी
आँखों में चित्र भी बनता होगा फिर मुरछा आती होगी
मिलन मधुर थी कठिन दूर से पर ख़्वाबों में रस पीते होगे
मैं सावन भर दूर रहा फिर कैसे दिन बीते होंगे
यही सुकोमल जिस्म करवाते भोर तलक़ लेता होगा
था कुछ भी नहीं यथार्थ मगर सपनो में सुख जीता होगा
अँगड़ाई भी बुरा मान कर अकड़ अकड़ सो जाती होगी
अपनी क़िस्मत ख़ुद को तन्हा देख बहुत मुसकती होगी
विश विरह के केवल मुख ही नहीं सब रोम रोम पीते होंगे
मैं सावन भर दूर रहा फिर कैसे दिन बीते होंगे
मैं भी तुम को याद याद कर मन ही मन मुस्काता था
दिल के अंतरमन में जा कर होंठों को फूल चढ़ता था
तुम मिली नहीं देखन सुन को और छुआन तुम्हारी मिली नहीं
फिर भी स्वाँस तुम्हारी थी और गीत तुम्हारे गाता था
है बड़ा प्रश्न मन में मेरे कैसे तुम जीते होगे
मैं सावन भर दूर रहा फिर कैसे दिन बीते होंगे















