ऐसी बेकार जवानी पे तरस आता है

मुझ को तो मेरी कहानी पे तरस आता है

जिन के मतलब कभी तुझ पे न खुलें जान-ए-जाँ
ऐसे लफ़्ज़ों के मआ'नी पे तरस आता है

तेरे चिल्लाने से अब फ़र्क़ नहीं पड़ता मुझे
तेरी इस तल्ख़ बयानी पे तरस आता है

जिस की क़िस्मत में समुंदर से न मिलना हो लिखा
ऐसे दरिया की रवानी पे तरस आता है

नहीं होता है इधर अगले की क़िस्मत पे यक़ीं
और उधर मुझ को पुरानी पे तरस आता है

— Ayush Aavart

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