परिंदे उड़ रहे हैं देख पाता हूँ

मगर मजबूर हूँ पिंजरे बनाता हूँ

वही मतलब भरा इक काम दोबारा
चलो आगे तुम्हारे पीछे आता हूँ

कहेगी ज़िन्दगी भी एक दिन मुझ से
मैं ग़फ़लत में बहुत चीज़ें भुलाता हूँ

वो मुझ से प्यार करती है छुपाती है
मैं उस से प्यार करता हूँ जताता हूँ

अगर 'आवर्त' उस दिन मर गया था तू
किसे मैं अपने पहलू में बिठाता हूँ

— Ayush Aavart

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