मैं जिस के दिल से बाहर आ रहा था

वो मेरे दिल के अंदर आ रहा था

बुरा था सो था जानाँ दुख तो ये है
कि झाँसे में मुक़द्दर आ रहा था

मैं तब भी क़तरों के पीछे पड़ा दोस्त
कि जब पीछे समुंदर आ रहा था

मुहब्बत की थी लेनी क्लास जिस
में
दिल अपना घर पे रख कर आ रहा था

मुसीबत मेरे सर पे आ रही थी
कि वो भी सीधे घर पर आ रहा था

कि फिर कहनी पड़ीं दो चार ग़ज़लें
कोई मेरे बराबर आ रहा था

— Ayush Aavart

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