Chetan
Chetan
Ghazal

पहचान हो गई है जब से खरे ग़मों की

करने लगे हिफ़ाज़त तेरे दिए ग़मों की

ये लेन देन जाने कब हो गई हमारी
मैं बस मेरे ग़मों का तू बस तेरे ग़मों की

रुख़सत किया है सब को हर बार ही ख़ुशी से
मेरे ग़मों को काटे आमद नए ग़मों की

इक तेरे जाम ही नइँ आँखों के मय-कदों में
बस तेरा हिज्र ही नइँ सफ़ में मेरे ग़मों की

लो मैं निकालता हूँ मुस्कान इन लबों पर
अब माँगना न चाबी मेरे छिपे ग़मों की

हम अब तलक़ भले थे शामिल थे सब ख़ुशी में
लगने लगे बुरे हम गिनती बढ़े ग़मों की

— Chetan

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