इस शोला-ए-अबस को बुझाया न जाएगा
दिल जल चुका है हाथ जलाया न जाएगा
सूरज हज़ार साज़िशें करता रहे मगर
दीवार के ख़िलाफ़ तो साया न जाएगा
डाली है उस ने पाँव में ज़ंजीर इश्क़ की
अज़्म-ए-सफ़र भी होगा तो जाया न जाएगा
ये कह के रुख़ को मोड़ लिया है हवाओं ने
बुझता हुआ चराग़ बुझाया न जाएगा
सब कह दो हम से शिकवा गिला हो मलाल हो
ख़ामोशियों का बोझ उठाया न जाएगा
भूले हैं ख़ुद को भूलें मगर किस तरह तुम्हें
यादों का नक़्श दिल से मिटाया न जाएगा
सय्याद से लिपट के ये कहता है इक परिंद
ख़ुद पर तो तुम से तीर चलाया न जाएगा
दिल में छिपाए बैठे हैं हम अपना हाल-ए-ज़ार
जो कह दिया तो आप से जाया न जाएगा
तन्हाइयाँ हैं ग़म है सितम है अज़ाब है
ये इश्क़ है जो तुम से निभाया न जाएगा
पूछो न हम से सहरा-नवर्दी की सख़्तियाँ
तुम से ग़ुबार-ए-दिल ये उड़ाया न जाएगा
हम ख़ाक हैं सो ख़ाक-नशीनी से 'फ़ैज़' है
बिस्तर पे अपना जिस्म सुलाया न जाएगा















