इस शोला-ए-अबस को बुझाया न जाएगा

दिल जल चुका है हाथ जलाया न जाएगा

सूरज हज़ार साज़िशें करता रहे मगर
दीवार के ख़िलाफ़ तो साया न जाएगा

डाली है उस ने पाँव में ज़ंजीर इश्क़ की
अज़्म-ए-सफ़र भी होगा तो जाया न जाएगा

ये कह के रुख़ को मोड़ लिया है हवाओं ने
बुझता हुआ चराग़ बुझाया न जाएगा

सब कह दो हम से शिकवा गिला हो मलाल हो
ख़ामोशियों का बोझ उठाया न जाएगा

भूले हैं ख़ुद को भूलें मगर किस तरह तुम्हें
यादों का नक़्श दिल से मिटाया न जाएगा

सय्याद से लिपट के ये कहता है इक परिंद
ख़ुद पर तो तुम से तीर चलाया न जाएगा

दिल में छिपाए बैठे हैं हम अपना हाल-ए-ज़ार
जो कह दिया तो आप से जाया न जाएगा

तन्हाइयाँ हैं ग़म है सितम है अज़ाब है
ये इश्क़ है जो तुम से निभाया न जाएगा

पूछो न हम से सहरा-नवर्दी की सख़्तियाँ
तुम से ग़ुबार-ए-दिल ये उड़ाया न जाएगा

हम ख़ाक हैं सो ख़ाक-नशीनी से 'फ़ैज़' है
बिस्तर पे अपना जिस्म सुलाया न जाएगा

— Dard Faiz Khan

More by Dard Faiz Khan

Other ghazal from the same pen

See all from Dard Faiz Khan →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling