न जाने क्यूँ मुझे अब ख़ुद पे इख़्तियार नहीं
फ़िराक़-ए-यार में दिल को कहीं क़रार नहीं
कोई भी हाल पे मेरे न ग़म-ज़दा होगा
मुझे पता है मिरा कोई सोगवार नहीं
ये मेरी आँख के अश्कों की ख़ुश्क साली है
ये दिल है गिर्या-कुनाँ चश्म अश्क-बार नहीं
रुसूख़ देख के धोखे में तुम न आ जाना
बड़े हैं लोग मगर साहिब-ए-वक़ार नहीं
तिरी जो याद है मदफ़ून मेरे सीने में
मिरा वजूद तिरे इश्क़ का मज़ार नहीं
गुलों में रंग ही तुझ से है इस लिए शायद
बहार जिस को समझते हैं वो बहार नहीं
पड़ा हुआ था लहद में मगर सुकून कहाँ
कि 'फ़ैज़' मुर्दा बदन महवे इंतिज़ार नहीं
— Dard Faiz Khan















