इश्क़ गो बे ज़बाँ नहीं होता

हाल ए दिल क्यूँ बयाँ नहीं होता

हर ज़मीं पर उसी का साया है
किस जगह आसमाँ नहीं होता

चोट जो दिल पे आके लगती है
उस का कोई निशाँ नहीं होता

माँ का साया नहीं है जिस घर में
वो कभी आशियाँ नहीं होता

जीती बाज़ी भी हार जाते हैं
हौसला जब जवाँ नहीं होता

दोस्त उस को बनाओ मत हरगिज़
जो कभी राज़दाँ नहीं होता

'फ़ैज़' जो क़ाफ़िले से हट जाए
रहबर ए कारवाँ नहीं होता

— Dard Faiz Khan

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Hausla Shayari

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