दीवानगी हदस ज़ियादा अच्छी होती नहीं
हदस ज़ियादा गर न हो फिर सच्ची होती नहीं
धोखे मिलेंगे दोस्तों से भी जवानी है ये
बचपन की हो गर दोस्ती फिर कच्ची होती नहीं
हम खेलते थे शौक़ से नादान गलियों में और
अब फ़्लैट में रहते है ऐसी मस्ती होती नहीं
मझधार में भी डूबने पर वो बचा लेती है
माँ बाप जैसी और कोई कश्ती होती नहीं
इक पल भी होता काफ़ी है ये ज़िंदगी जीने को
जो तोड़ पाए याद ऐसी रस्सी होती नहीं
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