मुसलमा हूँ सनम हम को सहूलत ये नहीं वरना
मैं तुम को माँग लेता उस जनम में आरज़ू कर के
मैं तुम से प्यार करने की निशानी और क्या ही दूँ
ले सुन ले धड़कने मेरी तू रख कर हाथ छू कर के
अरे अस
गर उन्हें तो चाहिए था एक शहज़ादा
तू कपड़े भी पहनता है रफ़ू पे फिर रफ़ू कर के
— Shadab Asghar















