तू मेरे अश्क जितने ही बहाएगा
तिरा भी वक़्त फिर नज़दीक आएगा
जलाया इश्क़ में कुछ इस क़दर मुझ को
ग़म-ए-दिल तुझ को भी हर-पल जलाएगा
ख़ुदा भी देखता ज़ुल्म-ओ-सितम का खेल
सितमगर दिन तिरा भी यूँ ही आएगा
किसी से यूँ मुहब्बत अब नहीं होगी
मुहब्बत गर हुई वो फिर सताएगा
दिल-ओ-जाँ लूट कर बे-घर किया तू ने
तिरा घर भी यूँ ही कोई लुटाएगा
— Famyas Siwani















