जंगल हरा भरा था बयाबान रह गया
गुल सूखते चले गए गुलदान रह गया
मैं जिस्म चूमता रहा माथे को छोड़कर
पूरी किताब ख़त्म की उनवान रह गया
दर जो खुला तो आ गए अंदर सभी मगर
बारिश में भींगता हुआ दरबान रह गया
रहती नहीं है याद मुझे बातें काम की
बेकार बात थी सो मुझे ध्यान रह गया
पर्चा जो इम्तिहान में आया अजीब था
मुश्किल सवाल हल हुए आसान रह गया
नाज़िल किताब ए इश्क़ किसी और पर हुई
ख़ाली किया हुआ मिरा जुज़्दान रह गया
दिल में बसे हुए हो मुबारक तुम्हें मगर
मैं भी कभी मकीन था मेहमान रह गया
— Farrukh Nadeem















