दिल में तो दहके शो'ले हैं
लब पर बारूदी गोले हैं
उन को भी हम से नफ़रत है
वो आग उगल कर बोले हैं
अंदर ही अंदर क़ातिल हैं
बाहर बाहर जो भोले हैं
दिल में दरवाज़ा बनता है
वो खिड़की अपनी खोले हैं
— Prakamyan Gautam
लब पर बारूदी गोले हैं
उन को भी हम से नफ़रत है
वो आग उगल कर बोले हैं
अंदर ही अंदर क़ातिल हैं
बाहर बाहर जो भोले हैं
दिल में दरवाज़ा बनता है
वो खिड़की अपनी खोले हैं
Other ghazal from the same pen
Shers of aag shayari collection.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling