दम-ए-रुख़्सत से पहले चेहरा उस का बस दिखा देना
बिना भूले मेरे महबूब को यारों सजा देना
तू सुन ले दिलरुबा मेरी ये तुझ से इक गुज़ारिश है
कि शाम-ए-ज़िंदगी पर नूर अपना मत बुझा देना
दिखाना मत वो हाल-ए-ज़ार मेरा अपनी आँखों से
कभी मिलना तो आब-ए-चश्म बस अपने छुपा देना
तलब इक आख़िरी बज़्म-ए-ग़ज़ल की पूरी कर देना
जनाज़े पर मेरे इक शम'-ए-महफ़िल तुम जला देना
नहीं मुझ को ज़रूरत आखिर-ए-दम पर ज़माने की
अगर हो पाए तो बस चार कंधे तुम उठा देना
भुलाकर सब यही मेरी ग़ज़ल इक याद तुम रखना
सुनाकर सब को याद-ए-रफ़्ता में मुझ को जगा देना
निज़ाम-ए-दहर को तो अब नहीं हम रोक सकते पर
तुझे 'हेमंत' क्या है जल्दी जाने की बता देना















