हर घडी ख़ामोश है, हर एक पल ख़ामोश है
ज़िन्दगी की दास्ताँ सुन कर अजल ख़ामोश है
सोचते थे हम लिखेंगे इक चहकती सी ग़ज़ल
दर्द इतना भर गया, सारी ग़ज़ल ख़ामोश है
पांडवों की एक ग़लती की वजह से आज यूँ
द्रोपदी को देख कर सारा महल ख़ामोश है
कल किसी ने कह दिया था आएगा तूफ़ान कल
बात सुन कर, रात से सारी फ़सल ख़ामोश है
एक वो दिन था कि इस
में तैरती थीं मछलियाँ
आज केवल रेत है, नदियों में जल ख़ामोश है
पक गया तो टूट कर गिरना पड़ेगा डाल से
बस यही सब सोच कर डाली पे फल ख़ामोश है
— Jitendra Tiwari















