कली कुछ और कहती है चमन कुछ और कहता है
मगर इन् तितलियों का आकलन कुछ और कहता है
शजर हैरान है पूछे किसे बारिश के बारे में
ज़मीं कुछ और कहती है गगन कुछ और कहता है
वो इक इंसान जो ख़ुद को बड़ा रहबर बताता है
उसी रहबर के बारे राहज़न कुछ और कहता है
ज़बाँ तो मुस्कुरा कर कह रही है ठीक है सबकुछ
मगर चेहरे का तेरे पैरहन कुछ और कहता है
इसी उलझन में थे रघुवर करूँँ तो क्या करूँँ आख़िर
सिया कुछ और कहती है हिरन कुछ और कहता है
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