उसी की दस्तरस में आ गया हूँ
मैं अब फिर से क़फ़स में आ गया हूँ
मेरा बुझना यहाँ वाजिब है अब तो
हवाओं के जो बस में आ गया हूँ
तुम्हारा हिज्र कटता भी नहीं अब
ये किस उम्र-ए-बरस में आ गया हूँ
मेरी पहचान है तुम सेे फ़क़त अब
तुम्हारे रंग-ओ-रस में आ गया हूँ
बड़ा मुश्किल है दिल का शाद होना
कि दुनिया की हवस में आ गया हूँ
जो चाहो तुम मुझे अब रंग दे दो
तुम्हारे कैनवस में आ गया हूँ
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