किसी को अब ये नफ़रत तोड़ देती है
किसी को अब ये सोहबत तोड़ देती है
भला पत्थर से कब दिल टूटते देखें
दिलों को तो मोहब्बत तोड़ देती है
ज़मीं से दूर हो कर क्यूँ बिखरते पेड़
इन्हें भी क्या ये फुर्क़त तोड़ देती है
जहाँ ये झूठों के बस मेंही तो है "मन"
यहाँ सच को सदाक़त तोड़ देती है
— Manish jain















