शब गुज़ारी हम ने तो रौशनी की ख़्वाहिश में

जागता रहा मैं तो बस उसी की ख़्वाहिश में

तुम मैं और इक दिलकश सा हमारा काशाना
देखता हूँ ये इक सपना ख़ुशी की ख़्वाहिश में

ऐब है नज़र आता काइ‌नात में मुझ को
क्या मैं हो गया हूँ पागल तुझी की ख़्वाहिश में

जान, ज़िंदगी क्यूँ कहते नहीं हो तुम मुझ को
बात मानी जाती है आख़िरी की ख़्वाहिश में

आँखें उन की ताहिर लगती हैं जैसे हो ज़मज़म
मैं तो डूब जाता हूँ सादगी की ख़्वाहिश में

— Manish jain

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