सर्द रातें तेरी यादें और इक तस्वीर है जान
तू नहीं क़िस्मत में तो क्या, तू ही हीर है जान
तेरे ख़त, मैसेज, पायल रक्खे है सँभाल कर याँ
अब कमाना कुछ नहीं है, ये मेरी जागीर है जान
जो कबूतर बैठा खिड़की पर उसे तुम मत उड़ाना
वो तों मेरी तुम से बातें करने की तदबीर है जान
तुम कहो आज़ाद कर दूँ, ख़ुद को अब इस क़फ़स से
तो करूँ कैसे, तेरे ही इश्क़ की ज़ंजीर है जान
रोज़ मुझ से कहती हों कुछ अपना लिक्खा ही सुना दो
लगता आशिक़ अपना क्या तुम को कोई मीर है जान
क्या कहा था तुम ने, मिलने एक दिन आओगी मुझ से
आज छुट्टी है आ जाओ तुम तो, कल फिर पीर है जान
— Manish jain















