दुश्मन इतना प्यारा कैसे हो सकता है
फिर दुश्मन है हमारा कैसे हो सकता है
जो कोई भी तेरी संगत में रहता हो
वो साला बे-चारा कैसे हो सकता है
तुमको पाकर तो सब कुछ जीता है उसने
तुमको पाकर हारा कैसे हो सकता है
जिस दरिया का पानी तुमने छूकर देखा
वो दरिया फिर खारा कैसे हो सकता है
जिसका ग़ुस्सा तुम ख़ुद क़ाबू करती हो अब
उसका ऊपर पारा कैसे हो सकता है
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