ज़िंदगी अब उजाड़ दूँगा मैं
तेरा हुलिया बिगाड़ दूँगा मैं
एक ही शख़्स है इधर मेरा
उस को भी छोड़-छाड़ दूँगा मैं
बालों को नोच कर के बैठा हूँ
सर भी अब तोड़-ताड़ दूँगा मैं
जा वहाँ से वो चाकू ले कर आ
आज काग़ज़ ये फाड़ दूँगा मैं
उस को फिर से गले लगा कर मैं
कुर्ते की मिट्टी झाड़ दूँगा मैं
— Amanpreet singh















