मैं किसी दिन दूर कर दूँगा उसे अय्यारी से
उड़ती हैं कट कर पतंगे अपनी ही आजादी से
इश्क़ में ढेरों ग़ज़ल मैं ने लिखी महबूब पर
अब दिखा दूँ सारी की सारी मगर हुश्यारी से
घोर अंधेरें में इक गुमनाम दीपक सा हूँ मैं
इक अजब सी रौशनी फैलेगी इस ख़ामोशी से
— Pritam sihag















