"वो साँवली लड़की"
वो मीर की मिसाल है कि ग़ालिब का दीवान
वो दाग़ का कमाल है की ज़फ़र का अरमान
वो शबाब गुलाब है खुली आँखों का ख़्वाब है
जिसे चुपके चुपके पढ़ें सभी वो तो वो किताब है
उस के झुमकों की लर्ज़िश से मंदिर की घंटियों की सदा आती है
वो साँवली लड़की किसी की मुझ को याद दिलाती है
वो दूजा शे'र ग़ज़ल का है वो अख़बार कल का है
उस के तबस्सुम पे गर कोई ठहरे तो ग़लत क्या है
सब का पैर तो साहिल में फिसलता है
जो धीमे-धीमे चलती है रंगत-ए-रुख़सार बदलती है
इत्र की शीशी शर्माती है वो साँवली लड़की किसी की मुझ को याद दिलाती है
मुँह नहीं कोई लगाता उस की आँखें तकने के बा'द
सब तो वाकिफ़ हैं , नशे में बंदा कुछ भी बोलता है
अब ख़ुदा जाने कि उस
में ऐसा भी क्या है कि उस के
आजू-बाजू होने वाला ख़ुद को हाजी बोलता है
उस का मिलना आसमाँ की सैर है हुस्न के देवता से सबका बैर है कि उस को ही सारा हुस्न दिया उस ने गले में हार डाला ज़ेवर ने उस को पहन लिया
वो चंदन का ज़खीरा है या कश्मीरी घाटी है
वो साँवली लड़की किसी की मुझ को याद दिलाती है
अँगूरी आँखों में जिस्म है उस का केसर का
वो चलता फिरता ताजमहल है सुनहरे संगमरमर का
काश हमारा उस के साथ उठाना बैठना होता
काश उस के ख़्यालों में हमारा ख़्वाब खोता
रब जाने वो ख़ुशबू किस आँगन में दौड़ लगाती है
वो साँवली लड़की किसी की मुझ को याद दिलाती है















