सारा सामान लिए घर से निकल आई है
फ़ोन पर फ़ोन लगाती हुई तन्हाई है
याद आने लगे हैं लोग मुझे गुज़रे हुए
दोस्त क्या तू ने मेरी झूठी क़सम खाई है
अपनी दुनिया में मगन रहना इसे कहते हैं
इक पलस्तर झड़ी दीवार पे जो काई है
बात जो दिल पे लगी है वो कोई बात नहीं
सर के ऊपर से गई बात में गहराई है
उस के पहलू में भला सोचता हूँ क्या क्या मैं
ख़्वाब में आ गया हूँ नींद नहीं आई है
— Rishabh Sharma















