बहुत उड़ते थे अब ठहरने लगे हैं
परिंदों के पर हम कतरने लगे हैं
जो सुनते नहीं अपने आगे किसी की
ग़लत सब को साबित ये करने लगे हैं
कि इतनी भी अच्छी नहीं है दलाली
नज़र से हमारी उतरने लगे हैं
क़सम दे के कहते मुझे मत बताना
जो हो सामना तो मुकरने लगे हैं
मिरे शे'र सुन कर जले जा रहे हैं
वो महफ़िल से देखो गुज़रने लगे
बहुत बोले हम तो मुकदमे चले हैं
तो जाना 'सचिन' क्यूँ सुधरने लगे हैं
— Sachin Sharma















