क़ल्ब-ए-तपाँ से आई सदा उस गली से चल
तकता है कोई रस्ता तेरा उस गली से चल
अर्श-ए-बरीं का चाँद जहाँ पर मकीन हैं
चल लेके आज बहर-ए-ख़ुदा उस गली से चल
मुझको है आज उसकी ज़ियारत की आरज़ू
एहसान होगा मुझपे तेरा उस गली से चल
सुन आशिकों के वास्ते अच्छी नहीं अना
तू तोड़कर के अपनी अना उस गली से चल
मौज़ू-ए-नौ ग़ज़ल के लिए मिल ही जाएगा
ऐ शायर-ए-ग़ज़ल तू ज़रा उस गली से चल
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Shajar Abbas
our suggestion based on Shajar Abbas
As you were reading Khuddari Shayari Shayari