rab hi jaane kya hua hai khair ho | रब ही जाने क्या हुआ है ख़ैर हो

  - Shajar Abbas

रब ही जाने क्या हुआ है ख़ैर हो
हर कोई ये कह रहा है ख़ैर हो

मैंने जो बोला था उसकी शान में
उसने वो सब सुन लिया है ख़ैर हो

राह-ज़न ही राह-ज़न हैं चार सू
राह में इक क़ाफ़िला है ख़ैर हो

तैश से जो देखा करता था मुझे
मुस्कुराकर देखता है ख़ैर हो

उसने ख़त भेजा है बरसों बाद में
और ख़त में ये लिखा है ख़ैर हो

अश्कों से दामन को अपने तर किए
रब से वो महव-ए-दुआ है ख़ैर हो

कल तलक जो दुश्मन-ए-जाँ था मेरी
मेरे हक़ में बोलता है ख़ैर हो

मौज़ू-ए-चर्चा है जिसका हुस्न वो
रु-ब-रु-ए आईना है ख़ैर हो

लब नहीं खोले थे जिसने 'उम्र भर
वो लबों को खोलता है ख़ैर हो

बे वफ़ा इंसान के देखो शजर
होंठो पे लफ़्ज़-ए-वफ़ा है ख़ैर हो

हर घड़ी जो हँसता रहता है शजर
हँसता हँसता रो पड़ा है ख़ैर हो

  - Shajar Abbas

Jalwa Shayari

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