फूल पर मानो तितलियाँ नहीं हैं

जिस के भी घर में बेटियाँ नहीं हैं

ज़िंदगी ऐसी खेल है जिस में
साँप हैं और सीढ़ियाँ नहीं हैं

मुझ को बारिश अज़ीज़ है यारों
यूँॅं ही कहता हूँ छतरियाँ नहीं हैं

उस को बच्चों के साथ देखा था
उस के हाथों में चूड़ियाँ नहीं हैं

मेरे इक बोसे से खुलेगी वो
उस तिजोरी की चाबियाँ नहीं हैं

— Asad Khan

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