मेरा चेहरा कभी दिन भर बनाती थी
कभी वो जाग कर दफ़्तर बनाती थी
सुनो मैं ऐसी इक लड़की से वाक़िफ़ था
धड़कते दिल को जो पत्थर बनाती थी
कलेजा ले गया मैं उस के हाथों तक
मुझे क्या इल्म था ख़ंजर बनाती थी
— SIDDHARTH SHARMA
कभी वो जाग कर दफ़्तर बनाती थी
सुनो मैं ऐसी इक लड़की से वाक़िफ़ था
धड़कते दिल को जो पत्थर बनाती थी
कलेजा ले गया मैं उस के हाथों तक
मुझे क्या इल्म था ख़ंजर बनाती थी
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