सदाएँ आती जब मुझ को भी अंदर से
ख़िज़ाँ का अक्स हो जाता हूँ बाहरस
हवा-ए-ग़म अगर हो दाइमी मुझ पे
हरा और ताज़ा हो सकता हूँ पैकर से
कमाई है मलाल-ओ-अश्क हम ने तो
सो बाग़-ए-हिज्र ही निकलेगा लॉकर से
जो शाख-ए-लब से टूटेगा समर मेरा
अभी लटका हुआ नज़रों के लंगर से
वही जो याद आना था नहीं आया
मुसीबत घूमती सरगोश नंबर से
उगी फसलें फ़ना तो सब ने काटी है
कभी जीती किसी ने शर्त अंबर से
तेरी बस तीन से तनक़ीद करता हूँ
मैं पंखों से दिवारों से व बिस्तर से
— Vishal Jha















