nahin hairat mohabbat men badan ko tum masal daalo | नहीं हैरत मोहब्बत में बदन को तुम मसल डालो

  - ALI ZUHRI

नहीं हैरत मोहब्बत में बदन को तुम मसल डालो
मेरी मानो मचलते दिल को तुम अपने कुचल डालो

घरों में लड़कियाँ अपनी जो तुम सब क़ैद रखते हो
मेरी मानो बुरी ये इक रिवायत है बदल डालो

के जिन के बीच है झगड़ा उसे वो ही भला जाने
मेरी मानो किसी के बीच में तुम मत ख़लल डालो

सभी तुम मस'अले अपने ख़ुदा पे छोड़ बैठे हो
मेरी मानो इबादत ऐसी तुम अपनी बदल डालो

मिटा के अब गुलिस्ताँ जो चले हैं चाँद पे बसने
मेरी मानो सभी ये ख़्वाहिशें उनकी कुचल डालो

बिना सोचे ख़ुदा पे वक़्फ़ अपनी ज़िन्दगी कर दी
मेरी मानो ये ऐसी बंदगी अपनी बदल डालो

भला क्या ख़ाक पढ़ पाओगे ये मोटी किताबें तुम
मेरी मानो सिलेबस में मेरी लिक्खी गज़ल डालो

चलो भी अब निकल आओ नया इक दौर लाना है
मेरी मानो ज़रूरत है ज़माना अब बदल डालो

  - ALI ZUHRI

Badan Shayari

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