"हिज्र में"
ये किताब गर जला जाती, तो अच्छा था
ख़ुद ही मुझे तुम मिटा जाती, तो अच्छा था
बिखेर कर कोई किसी का सपना नहीं जाता
जैसे गई तुम, यूँ भी कोई अपना नहीं जाता
होकर दिलबर बेज़ार तुझ से मैं जीउँगा कैसे
ज़हर ये जुदाई का तड़प के मैं पीउँगा कैसे
जीने का उपाय बता जाती, तो अच्छा था
ख़ुद ही मुझे तुम मिटा जाती, तो अच्छा था
बड़े ख़ुश हो बर्बाद कर मुस्कुरा के जा रहे हो
रोता देख सुकूँ मिला जो रूला के जा रहे हो
मेरी मोहब्बत का तू ने तो मज़ाक़ बनाया है
आशिक़ का दिल तू ने ख़ाक में मिलाया है
मेरे दिल को आग लगा जाती, तो अच्छा था
ख़ुद ही मुझे तुम मिटा जाती, तो अच्छा था















