तुझे हो मुबारक तिरी बे-वफ़ाई
मैं ख़ुश हूँ कि मैं ने मोहब्बत निभाई
तुम्हारा तअल्लुक़ है इक नेक घर से
तुम्हें ज़ेब देती नहीं बे-हयाई
मिरा दिल दुखा भी तो क्या ग़म कम-अज़-कम
असीर-ए-मोहब्बत ने पाई रिहाई
नया इश्क़ कर या मना पिछले का ग़म
कुआँ तेरे आगे है पीछे है खाई
रहे दोस्ती बाद-ए-तर्क-ए-मोहब्बत
ये बात आप की रास मुझ को न आई
जो मंज़र नहीं देखना चाहता मैं
वही मुझ को देता है अक्सर दिखाई
ज़माना मुझे गर बुरा कह रहा है
ज़माने की होगी इसी में भलाई
वो सब्र आज़माए करम करने से क़ब्ल
बहुत बार मैं ने ये बात आज़माई
उदास आज था मैं सदा की तरह 'ज़ान'
सदा की तरह फिर ग़ज़ल गुनगुनाई















