tiri zulfon men dil uljha hua hai | तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है

  - Akbar Allahabadi

तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है
बला के पेच में आया हुआ है

न क्यूँँकर बू-ए-ख़ूँ ना
में से आए
उसी जल्लाद का लिक्खा हुआ है

चले दुनिया से जिस की याद में हम
ग़ज़ब है वो हमें भूला हुआ है

कहूँ क्या हाल अगली इशरतों का
वो था इक ख़्वाब जो भूला हुआ है

जफ़ा हो या वफ़ा हम सब में ख़ुश हैं
करें क्या अब तो दिल अटका हुआ है

हुई है 'इश्क़ ही से हुस्न की क़द्र
हमीं से आप का शोहरा हुआ है

बुतों पर रहती है माइल हमेशा
तबीअत को ख़ुदाया क्या हुआ है

परेशाँ रहते हो दिन रात 'अकबर'
ये किस की ज़ुल्फ़ का सौदा हुआ है

  - Akbar Allahabadi

Ulfat Shayari

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