जान दी किस के लिए हम ये बताएँ किस को

कौन क्या भूल गया याद दिलाएँ किस को

जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा है
हम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस को

रूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न था
वो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को

कौन देता है यहाँ ख़्वाब-ए-जुनूँ की ता'बीर
ख़्वाब हम अपने सुनाएँ तो सुनाएँ किस को

कोई पुरसान-ए-वफ़ा है न पशीमान-ए-जफ़ा
ज़ख़्म हम अपने दिखाएँ तो दिखाएँ किस को

चाक-ए-दिल चाक-ए-गरेबाँ तो नहीं हम-नफ़सो
हम ये तस्वीर सर-ए-बज़्म दिखाएँ किस को

कौन इस शहर में सुनता है फ़ुग़ान-ए-दुर्वेश
अपनी आशुफ़्ता-बयानी से रुलाएँ किस को

हो गया ख़ाक रह-ए-कू-ए-मलामत 'अख़्तर'
राह पर लाएँ जो अहबाब तो लाएँ किस को

— Akhtar Saeed Khan

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